राखी

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पानी और सिस्टम

मैंने एक लेख लिखा था जिसमे खत्म होते #पानी को सहेजने के विषय में लिखा था।मैं उसे किसी बडी पत्रिका मे छपवाना चाहती थी ताकि अधिक लोगों तक मेरी बात पहुंचे।वह लेख अब भी मेरी डायरी मे पडा है।

हां तो उस लेख में यह जिक्र है कि आने वाले वर्षों में जो युद्ध होगा वह सिर्फ पानी के लिए होगा। ऐसा मैं अपने आसपास में महसूस भी करने लगी हूं।लगभग हर घर में खुदाई चालू है।जमीन से पानी निकालने की जद्दोजहद चारों तरफ दिखाई दे रही है सप्लाई का पानी बहुत कम लोगों को भा रहा है क्योंकि सप्लाई के पानी में सफाई एक बड़ी समस्या है।

लेकिन लोगों की समझदारी पर मैं हैरान हो जाती हूं जो हर बात में सिस्टम को घसीटते हैं और खुद घिसी पिटी बुद्धिजीविता की फटी चादर ओढे एक कोने में दुबके रहते हैं।जिस सिस्टम की हम बात करते हैं वह सिस्टम क्या हमारे दैनिक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है?क्या लखनऊ का हर एक व्यक्ति स्वच्छ पानी पी रहा है?

शायद लखनऊ के नगर निगम को इस बात का आभास भी नहीं होगा कि लखनऊ में कई ऐसे कालोनियां है जिन्होंने अपना एक निजी सिस्टम बना रखा है, जिसमें साफ सफाई पीने का पानी बिजली की व्यवस्था आदि शामिल है। आखिर लोगों को यह निजी सिस्टम बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

उत्तर साफ है- सरकारी महकमे का केवल शिलापट्ट पर नाम लिखाने के अलावा और कोई काम नही है। #भूजल पर कोई कानून नहीं बना है यही कारण है कि पानी को लोग अपनी बपौती समझते हैं। जिनके घरों में समर्सिबल पंप लगे हैं उनके हाथ अलादीन का चिराग है।टंकी बह रही है…बहने दो, आर-ओ के बेकार पानी को भी बहने दो, हमारा क्या जाता है!

भाई पेड़ तो लगा रहे हो लेकिन जब पानी नही रहेगा तो इतने पेडों को पिलाओगे क्या ?

इस खूबसूरत शहर का तो ख्याल करो …

मैं इसी में खुश हूं

मैं इसी में खुश हूं,

कि तुम मुझे मना लेते हो।

भले महीनों मन की मेरे

सुधि ना लेते हो,

पर मैं इसी में खुश हूं,

कि तुम मुझे मना लेते हो ।।

चादरें कितनी भी तान लूं

नाराजगी की,

आंधियाँ इश्क की चलाकर

मुझको जगा देते हो,

मैं इसी में खुश हूं

कि तुम मुझे मना लेते हो।।

सुषमा स्वराज

“किसी का चले जाना
यों ही नहीं होता
उसके पहले जाने
की सभी तैयारियां
कर ली जाती हैं,
जाने या अनजाने में
ही सही
लेकिन कोई
यों ही नहीं जाता,
जैसे आप अचानक
चली गईं..
पर सारी तैयारियां
कर रही थीं,
मसलन चुनाव
ना लड़ना,
बिछड़े लोगों को
मिलवाना और
कई घरों को
फिर से बसाना,
यों ही नहीं कर
रही थीं आप,
जाने अनजाने
कितनी तैयारियां
कर रहीं थीं आप,
भारत की बिन्दी
को माथे पर सजाकर
यों हीं नहीं लड़ रहीं
थीं आप
आपका जाना
दुख दे रहा है, नेत्र
सजल हैं
जैसे कोई
बेहद अपना
चला गया हो,
हर नेता को
आप जैसा बनना चाहिए
ताकि लोग कहें
कि नेता का जाना
यों ही नहीं होता
यों ही नहीं होता ….”
#Rip to #SUSHMASWARAJ

-#rituja_singh_baghel
Lucknow

जम्मूकश्मीर यात्रा संस्मरण भाग -1

गुलमर्ग (कश्मीर) 10 अप्रैल सन् 2009 को इतनी बर्फ देखकर मेरी दोनो बेटियां बेहद खुश थीं।कोई बर्फ के गोले बनाती तो छोटी बर्फ को उठाकर खाने लगती। ठंडी सफेद इन चादरों को बस देखते रहने का मन होता था।

हमलोग गंडोला से घूमकर आए तो मन ही नही हो रहा था कि वापस श्रीनगर जाएं।गुलमर्ग में श्रीनगर की अपेक्षा बेहद रौनक थी।नए जोडे अपने प्रेम की हर शै पर खरा उतरना चाहते थे। नए-नए चूड़े में सजी हुई नवयौवनाएं अपने पतियों के संग धरती के इस स्वर्ग को जी भरकर देख लेना चाहतीं थीं।

हमें मुमताज और राजेश खन्ना पर फिल्माए “जय जय शिव शंकर”.. वाले गाने के उस स्थान को देखना था। वह एक शिव मंदिर था जो थोड़ी ऊंचाई पर था लेकिन वहां तक पूरी बर्फ जमी हुई थी और हमें बर्फ से होकर ऊपर मंदिर में दर्शन करने जाना था। हमारे पास बूट नहीं थे। मेरा और निहारिका का बूट बीएसएफ कैंप में छूट गया था और हम लोग खूबसूरत वादी देखने के अति उत्साह में बिना बूट पहने हीं आ गए थे।

अब हमें साधारण चप्पलों में उस मंदिर तक पहुंचना था पैर चलते चलते बर्फ में धंस जाते। एक बार तो बर्फ के नीचे कुनकुनी ठंडे पानी में मेरा पैर चला गया।मेरे पतिदेव मेरे साथ थे। उन्होंने मुझे खींच कर निकाला।हमारे दोनों बच्चों को बीएसएफ के जवानों ने मंदिर तक पहुंचा दिया। लेकिन हम लोग अटके हुए थे। मंदिर तक पहुंचना पहाड़ सा प्रतीत हो रहा था।

बर्फ पर हाथ से खींचने वाले एकाध स्थानीय निवासी जो लोगों को बर्फ की स्लैब पर चलने वाली हाथगाडी चलाते थे, हमारे पीछे लग गए। वह कहते कि आप इस पर बैठ जाइए हम लोग आपको पर पहुंच जाएंगे।पर मुझे लगता किस पर बैठने से कहीं में सचमुच ऊपर ही ना पहुंच जाऊं।मैंने मना कर दिया और हमने निर्णय किया कि मैं पैदल ही ऊपर मंदिर तक जाऊंगी।
इसके दो कारण थे पहला तो यह कि इससे मुझे मेरे पति का साथ मिल जाता जिससे मुझे भी उन नवविवाहिताओं सा अनुभव होता और दूसरा भगवान तक मैं पैदल पहुंचूं इसका पुण्य भी प्राप्त करना था।अंततः हम लोगों को भोले शंकर के दर्शन हुए। पैर पूरे सुन्न थे।लेकिन जब मंदिर में पहुंचे तो लगा जैसे पैरों को कुछ हुआ ही ना हो।अद्भूत था वह सब।

ऐसा लगा जैसे भोलेनाथ हमारी ही प्रतीक्षा कर रहे हों।इतने वर्षों बाद भी वो स्मृतियां मन में वैसे ही अंकित हैं।

#जम्मूकश्मीरयात्रावृतांतभाग-1
-ऋतुजा सिंह बघेल

जम्मूकश्मीर यात्रा संस्मरण भाग -1

गुलमर्ग (कश्मीर) 10 अप्रैल सन् 2009 को इतनी बर्फ देखकर मेरी दोनो बेटियां बेहद खुश थीं।कोई बर्फ के गोले बनाती तो छोटी बर्फ को उठाकर खाने लगती। ठंडी सफेद इन चादरों को बस देखते रहने का मन होता था।

हमलोग गंडोला से घूमकर आए तो मन ही नही हो रहा था कि वापस श्रीनगर जाएं।गुलमर्ग में श्रीनगर की अपेक्षा बेहद रौनक थी।नए जोडे अपने प्रेम की हर शै पर खरा उतरना चाहते थे। नए-नए चूड़े में सजी हुई नवयौवनाएं अपने पतियों के संग धरती के इस स्वर्ग को जी भरकर देख लेना चाहतीं थीं।

हमें मुमताज और राजेश खन्ना पर फिल्माए “जय जय शिव शंकर”.. वाले गाने के उस स्थान को देखना था। वह एक शिव मंदिर था जो थोड़ी ऊंचाई पर था लेकिन वहां तक पूरी बर्फ जमी हुई थी और हमें बर्फ से होकर ऊपर मंदिर में दर्शन करने जाना था। हमारे पास बूट नहीं थे। मेरा और निहारिका का बूट बीएसएफ कैंप में छूट गया था और हम लोग खूबसूरत वादी देखने के अति उत्साह में बिना बूट पहने हीं आ गए थे।

अब हमें साधारण चप्पलों में उस मंदिर तक पहुंचना था पैर चलते चलते बर्फ में धंस जाते। एक बार तो बर्फ के नीचे कुनकुनी ठंडे पानी में मेरा पैर चला गया।मेरे पतिदेव मेरे साथ थे। उन्होंने मुझे खींच कर निकाला।हमारे दोनों बच्चों को बीएसएफ के जवानों ने मंदिर तक पहुंचा दिया। लेकिन हम लोग अटके हुए थे। मंदिर तक पहुंचना पहाड़ सा प्रतीत हो रहा था।

बर्फ पर हाथ से खींचने वाले एकाध स्थानीय निवासी जो लोगों को बर्फ की स्लैब पर चलने वाली हाथगाडी चलाते थे, हमारे पीछे लग गए। वह कहते कि आप इस पर बैठ जाइए हम लोग आपको पर पहुंच जाएंगे।पर मुझे लगता किस पर बैठने से कहीं में सचमुच ऊपर ही ना पहुंच जाऊं।मैंने मना कर दिया और हमने निर्णय किया कि मैं पैदल ही ऊपर मंदिर तक जाऊंगी।
इसके दो कारण थे पहला तो यह कि इससे मुझे मेरे पति का साथ मिल जाता जिससे मुझे भी उन नवविवाहिताओं सा अनुभव होता और दूसरा भगवान तक मैं पैदल पहुंचूं इसका पुण्य भी प्राप्त करना था।अंततः हम लोगों को भोले शंकर के दर्शन हुए। पैर पूरे सुन्न थे।लेकिन जब मंदिर में पहुंचे तो लगा जैसे पैरों को कुछ हुआ ही ना हो।अद्भूत था वह सब।

ऐसा लगा जैसे भोलेनाथ हमारी ही प्रतीक्षा कर रहे हों।इतने वर्षों बाद भी वो स्मृतियां मन में वैसे ही अंकित हैं।

#जम्मूकश्मीरयात्रावृतांतभाग-1
-ऋतुजा सिंह बघेल